रविवार, 8 दिसंबर 2024

वकीलों का संघर्ष: सड़क दुर्घटना में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष अधिवक्ता राकेश चतुर्वेदी

     


  राकेश जी की हालत हमें इस कड़वी सच्चाई का सामना कराती है, उनके इलाज के लिए भारी खर्च की आवश्यकता है, लेकिन न तो बार एसोसिएशन और न ही राज्य अधिवक्ता परिषद से कोई तत्काल आर्थिक सहायता अब तक उपलब्ध हो सकी है, यह स्थिति न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि इस बात की ओर भी इशारा करती है कि अधिवक्ताओं के कल्याण के लिए हमारी व्यवस्थाएं कितनी कमजोर हैं।

---------------(संदीप तिवारी, एड.)---------------


राकेश चतुर्वेदी अधिवक्ता, आज नागपुर के एक अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे हैं,एक सड़क दुर्घटना ने न केवल उनके शारीरिक स्वास्थ्य को गंभीर चोट पहुंचाई है, बल्कि उनके परिवार और जीवन के सपनों पर भी संकट ला खड़ा किया है।हमारे समाज में वकीलों को प्रायः आर्थिक रूप से सक्षम और प्रतिष्ठित माना जाता है। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न है, छोटे कस्बों और शहरों में काम करने वाले अधिकांश अधिवक्ता, विशेषकर युवा वकील, आर्थिक रूप से संघर्षरत होते हैं, हर केस उनकी आजीविका का साधन होता है, और ऐसे में किसी आकस्मिक घटना, जैसे दुर्घटना या बीमारी, से उबरने का कोई सुरक्षा कवच उनके पास नहीं होता।

हालांकि  तुच्छ रूप मे ही राज्य अधिवक्ता कल्याण निधि जैसी योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन इनका लाभ उठाने की प्रक्रिया इतनी जटिल और धीमी है कि आपातकालीन स्थिति में यह बेअसर साबित है।राकेश जी जैसे अधिवक्ताओं की स्थिति पर ध्यान न देना, केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं है; यह पूरे वकालत समुदाय की असुरक्षा को दर्शाता है। हे राम, क्या होगा....?

राकेश चतुर्वेदी अधिवक्ता के साथ  घटी घटना हमारी संवेदनाओं को झकझोरती है,
सवाल यह है कि क्या हम, एक समाज और एक व्यवस्था के रूप में, उनके संघर्ष को अनदेखा करते रहेंगे, क्या "न्याय" के लिए लड़ने वाले योद्धाओं के लिए कोई न्याय होगा.............?यह घटना केवल एक हादसा नहीं है, यह हमें आत्ममंथन का मौका देती है, यदि अब भी हम नहीं जागे, तो आर्थिक रूप से कमजोर वकीलों के जीवन में कोई बदलाव नहीं आएगा।राकेश जी के जल्द स्वस्थ होने की कामना के साथ, (संदीप तिवारी एड.)

गुरुवार, 5 दिसंबर 2024

संभल से शहडोल तक..टाइगर अभी जिंदा है...? (त्रिलोकी नाथ)



 सोचा था विपक्ष के नेता हो जाने के बाद कुछ अंत्री-मंत्री जैसी संवैधानिक सुरक्षा मिल जाती होगी कि वह अपनी बात कहेगा तो उसको सुना भी जाएगा या फिर उसको कहीं भी आने-जाने की कुछ प्रधानमंत्री जैसी छूट होगी लेकिन मन बहुत दुखी हुआ क्योंकि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को पुलिस ने सड़क में रोक दिया कि आप संभल नहीं जा सकते, क्योंकि हम नहीं चाहते. कारण गिना  दिया.नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी फिर वही कागज का किताब वाला संविधान लेकर कुछ पत्रकारों को बताने लगे कि इसमें कुछ लिखा है जिसके कारण मैं वहां जा रहा हूं

लेकिन यह लोग मुझे नहीं जाने दे रहे हैं ..और इस प्रकार 2014 के बाद मिली आजादी में  नेता प्रतिपक्ष की हैसियत हमें उतनी ही दिखाई जितनी हमारी शहडोल में है. उससे ज्यादा कुछ नहीं... हम भी कागज लिए आदिवासी क्षेत्र में आदिवासियों की तरह भटकते रहते हैं कि यह संविधान है, यह कानून है.. इसको थोड़ा सा मानिए..

---------------- (त्रिलोकी नाथ)--------------

 लेकिन ऐसा दूर-दूर तक होता नहीं दिखता... और हो भी क्यों ना मध्यप्रदेश कोई उत्तरप्रदेश तो है नहीं की जहां दमदार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सूरज चमक रहा हो और जहां आदित्यनाथ नहीं है वहां पर मुझ त्रिलोकी नाथ  की क्या हैसियत.. यह बात मैं गर्व से सोच सकता हूं क्योंकि अगर मैं आदित्यनाथ के राज्य में होता तो जैसे संभल में एक मस्जिद में मंदिर होने का शक होने के कारण "चट-मंगनी पट-ब्याह" के तर्ज पर कोर्ट में याचिका गई.. कोर्ट ने सुनवाई किया... कोर्ट ने आर्डर पारित किया और पूरा प्रशासन कोर्ट के आदेश को पालन करने में शाम के ही लग गया... ऐसा कहा जाता है इतनी ईमानदारी से इतनी कर्तव्य निष्ठा जो कार्यवाही हो रही थी वह गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में योगी आदित्यनाथ जी का नाम दर्ज कर सकती थी... किंतु दुर्भाग्य..? 

 


      लेकिन यह दुर्भाग्य मध्यप्रदेश में हमारे लिए सौभाग्य बन जाता.. अगर आदित्य योगीनाथ मुख्यमंत्री होते तो मध्य प्रदेश में न्यायपालिका ने जो 2012 में आदेश पारित किया था की शहडोल के मोहन राम मंदिर ट्रस्ट मामले में "स्वतंत्र कमेटी को समस्त प्रभार दे दिए जाएं.." पूजा पाठ छोड़कर, क्योंकि वह पंडित-पुजारी का धंधा है इसलिए रोजाना की पूजा पाठ का काम पंडित पुजारी को दिया जाए बाकी पूरा काम एक स्वतंत्र कमेटी बनाकर उसको दे दिया जाए... उसे आज तक यानी 12 साल बीतने के बाद भी न्यायपालिका का वह आदेश क्रियान्वयन हो पाने  में मोहताज हो रहा है ...

अगर यही आदेश जैसा कि योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश के संभल में हुआ हुआ होता और अगर वह हाई कोर्ट का होता तो उसे तो 12 घंटे भी नहीं लगता और आदेश की क्रियान्वयनवित हो गया होता... क्योंकि मस्जिद के अंदर मंदिर दबे होने का का मामला था.. इसलिए 24 घंटे में क्रियान्वन का प्रयास किया जा रहा था...

 बहरहाल हमारे यहां करीब 21 साल से हिंदू राज्य क सपना


साकार हो रहा है.. हिंदू सनातन धर्म को ईमानदारी पूर्ण तरीके से लागू करने का युद्ध भी इन दिनों चल रहा है.. लेकिन शहडोल के संभाग मुख्यालय स्थित मोहन राम मंदिर में 12 साल बीत जाने के बाद भी न्यायपालिका, कार्यपालिका से यह अपेक्षा नहीं कर पा रही है कि उसके आदेश का पालन हो सके... ऐसा नहीं है कि कार्यपालिका आदेश का पालन नहीं करना चाहती किंतु कहा यह जाता है कि विधायिका, न्यायपालिका के आदेश को अप्रत्यक्ष तौर पर पालन नहीं करने दे रही है... यही कारण है की 2012 का आदेश अपने पालन के लिएदर-दर ठोकर  रहा है... और जब भी कार्यपालिका में कोई ईमानदार अधिकारी स्वयं को "जिंदा हूं.." रखने का प्रयास करता है तो उसके जमीर को नेस्तनाबूद करने के लिए हिंदुओं का तथाकथित समूह धर्म का नकाब पहनकर दीवार बनकर खड़ा हो जाता है...

 और अंततः अधिकारी हथियार डाल देता है. इस बार भी वही होता दिख रहा है.. 13 जून 2024 को अंतिम बार शहडोल के अनुविभागी अधिकारी अरविंद शाह (आईएएस) ने  फिर प्रयास किया की न्यायपालिका को गर्व कर सके की कार्यपालिका अपने जिम्मेदारी को कर्तव्य निष्ठा समझकर कार्रवाई कर रही है...; और कर सकती है.. किंतु कथित रूप से विधायिका ने उसके हाथ पैर बांध दिए और वे अंततः लगभग अपराधी हो चुके समूह के सामने हथियार डाल दिए.... और 2012 का आदेश फिर एक बार ठंडे बस्ती में डाल दिया गया...


 क्योंकि जैसे संभल के प्रशासन के सामने एक भीड का सामना करने में करीब 5 आदमी की मौत हो गई इस तरह प्रशासन भयभीत होकर शहडोल की भीड़-तंत्र को चुनौती नहीं देना चाहता... क्योंकि प्रशासन को मालूम है अगर मुसलमान का भीड़-तंत्र जो मुट्ठी भर हैं वह खतरनाक है तो जो हिंदुओं का भीड़ तंत्र सत्ता में है वह उसे कहीं का नहीं छोड़ेगा... और इसी भय से आज तक मध्य प्रदेश हाई कोर्ट न्यायपालिका का आदेश विधायिका के अप्रत्यक्ष दबाव में लगभग मृत अवस्था में पड़ा हुआ है... किंतु वह मरा नहीं है क्योंकि हाई कोर्ट आदेश को आशा है कि कोई तो होगा ..जो आएगा और उसे जिंदा करके उसके अधिकार सौंप कर आदेश का पालन कर न्यायपालिका को बता सकेगा की टाइगर अभी जिंदा है…..




बुधवार, 4 दिसंबर 2024

आसमान से गिरे, यह जमीन से उगे...; लेकिन आज होगी, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की शपथ- (त्रिलोकी नाथ)

 


आज 5 दिसंबर है डॉन का फरमान है बॉम्बे में मीटिंग रखो वहीं पर मुख्यमंत्री कि शपथ होगी... यह बात और है कीकुर्सी में बादशाह होगा या बेगम अथवा गुलाम या फिर जोकर.... यह ताश के पत्तों से सुनिश्चित होगा.. जब पत्ता खुलेगा, मुख्यमंत्री प्रगट  हो जाएगा, कोई चिंता की बात नहीं। कभी यह सब चलचित्र में चरित्र होते थे और सिनेमा घर से आम जनता का मनोरंजन हुआ करता था। अब यह सब भारत की आर्थिक राजधानी की कड़वी सच्चाई है।प्रसिद्ध आंदोलनकारी अन्ना हजारे का कहना है "राजनीति का मतलब, पैसे से सत्ता और सत्ता से पैसा... यही होकर रह गई है। मुंबई में आज इसका प्रमाणित अवतार होगा। 

-----------(त्रिलोकी नाथ)--------------


क्योंकि उसे मालूम है की चुनाव किस नीति से जीता गया है तो जीत का सहारा उसकी कृपा से तय होना चाहिए था। लेकिन बाल ठाकरे की विचारों से निर्मित भाजपा में समर्थन दे रही पूर्व मुख्यमंत्री शिंदे की शिवसेना अभी भी ठाकरे की भाषा में विश्वास रखते हैं... अब तो खुलकर बात आ गई कि अगर गृह मंत्री का पद उन्हें मिलता है तो वह उपमुख्यमंत्री बनने को तैयार हैं जबकि मुख्यमंत्री के दावेदार देवेंद्र फडणवीस गृह मंत्रालय यानी डान की ताकत को जानते हैं.. इसलिए वह गृह मंत्रालय शिवसेना को नहीं देना चाहते; नाराज मुख्यमंत्री शिंदे बीमार हो जाते हैं और अपने गांव चले जाते हैं। एक बात और आई थी कि वित्त मंत्रालय भी शिवसेना को चाहिए लेकिन वहां तो हजारों करोड़ों रुपए के आरोपी होकर मुक्त होने वाले शरद पवार के भतीजे भाजपा को समर्थन दे रहे ।अजित पवार ने कब्जा कर रखा है कुछ तो उन्हें भी देना पड़ेगा अन्यथा महायुति का क्या मतलब.... बात भ्रष्टाचार की नैतिकता की भी है आखिर इसका भी अपना एक धर्म है. इसलिए मुख्यमंत्री पद से त्याग एकनाथ शिंदे को निर्णय नहीं करने दे पा रहा है...

बहरहाल इस तरह सब की हालत "कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय; या पाये बौराये नर, व पाये बौराये "की हालत में पहुंच गई है। पूरी महाराष्ट्र की सत्ताधारी राजनीति कुछ इसी चरित्र में अभिनय कर रही है और इसीलिए अकल्पनीय बहुमत सिद्ध होने के बाद भी भाजपा में मुख्यमंत्री नहीं बन पा रहा था।

 अंततः डॉन को निर्णय लेना पड़ा की पांच दिसंबर को शपथ होगा याने मुख्यमंत्री तय नहीं हुआ था और शपथ सुनिश्चित हो गया । तो चुपचाप मान जाएं नहीं तो जोकर का मुख्यमंत्री बनना तय है। अब थोड़ा सा बात इस बात की है की महाराष्ट्र भारत की आर्थिक राजधानी है तो थोड़ा वजनदार मुख्यमंत्री होना ही चाहिए... जो अपने विवेक से भी निर्णय कर सके अन्यथा मुख्यमंत्री किसी को भी बनाया जा सकता है। जैसा की अन्य राज्यों में बीजेपी करती चली आई है। उसका राजनीतिक धरातल वोट राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। जीतना, चुनाव का सुनिश्चित परिणाम है और जीत की गारंटी का ज्ञान "महामंत्र" भाजपा की रणनीत कारों को मालूम हो चुका है। क्योंकि लोकतंत्र सत्ता में बने रहने की जीत पर सुनिश्चित है और इस महामंत्र के बाद किसी को क्यों भ्रम होना चाहिए कि उसे क्या मांगना है। जो दिया जा रहा है उसे पर आनंद और परमानंद खोजना चाहिए। यह बात ढाई साल में भी अगर सत्ता के सहयोगी रहे शिवसेना और एनसीपी के लोग नहीं समझ पाए हैं तो उनकी गलती है।
 आज उसका भ्रम टूट जाएगा और यह सुनिश्चित हो जाएगा ताश के पत्तों की बाजीगरी का बाजीगर महाराष्ट्र से नहीं आता है, वह "संयुक्त-महाराष्ट्र" से तय होता है क्योंकि संयुक्त महाराष्ट्र में गुजरात शामिल था अगर महाराष्ट्र टूटकर अलग हो गया तो यह उसका अपराध था, इसलिए डॉन 5 दिसंबर का तारीख मुकर्रर कर दिया है... बस ताली बजाने की जरूरत है और मुख्यमंत्री प्रकट हो जाएगा यही भारतीय राजनीति का बदलाव है और कुछ नहीं....









रविवार, 1 दिसंबर 2024

"गर्व से कहो कि हम भ्रष्टाचारी हैं...?- 6" भ्रष्टाचार के लिये महायज्ञ...? ( त्रिलोकीनाथ )

        महायज्ञ 1997-1998 में सोनी टीवी पर प्रसारित एक भारतीय टेलीविजन शो यादगार टीवी सीरियल है। अनिल चौधरी द्वारा लिखित, निर्मित और निर्देशित, इस राजनीतिक नाटक में मनोहर सिंह, रोहिणी हट्टंगड़ी, गोविंद नामदेव ने अभिनय किया, जबकि अनन्या खरे, मुरली शर्मा, कुमुद मिश्रा और अन्य ने अपने लोकप्रिय भूमिका अदा की।राजनीति में भ्रष्टाचार को आम जीवन में उतरने का यह पारदर्शी चित्रण रहा करीब  25 साल बाद अब यह सांकेतिक महायज्ञ, धार्मिक महायज्ञ के रूप में भी भ्रष्टाचार को आत्मसात करने लगा है। महायज्ञ अब लोकहित के लिए ही हो यह जरूरी नहीं है यह भ्रष्टाचार के संरक्षण के लिए आतंक और भय दिखाने के लिए भी अब होने लगे हैं, इसमें कोई शक नहीं है। क्योंकि इससे प्रशासनिक अधिकारी अपने कर्तव्य को भूलकर विवाद नहीं पालना चाहते। यह सब पारदर्शी है।

-----------------( त्रिलोकीनाथ )---------------------



  तो बात कर रहे थे महायज्ञ टीवी सीरियल की उस "महायज्ञ " के नायक राष्ट्रीय नाटक ड्रामा के प्राध्यापक रहे मनोहर सिंह शहडोल में महिला मंडल में जब हमारे "राजा की रसोई" का मंचन किया था उसे समय के चीफगेस्ट रहे.. हालांकि तब हमें नहीं मालूम था कि यह मनोहर सिंह यादगार सीरियल में बड़े-ठाकुर की भूमिका अदा करेंगे. उसे समय यह जरूर चर्चा रही कि अनूपपुर के पास सीतापुर गांव में उपसंहार नामक एक फिल्म की शूटिंग के संदर्भ में शहडोल आए थे. बाद में यह किन्हीं कारणो से रिलीज नहीं हो पाई। किंतु मनोहर सिंह से जो संक्षिप्त मेरी मुलाकात रही उस कारण भी उनके व्यक्तित्व को  महायज्ञ में अन्य फिल्मों में चरित्र चित्रण को जीवंत रूप में देखा।

 इसलिए भी तब पतित हो रही राजनीति का सांकेतिक "महायज्ञ" यादगार टीवी सीरियल रहा।  महायज्ञ यह दिखाया था कि किस प्रकार से स्थानीय नेता पूरे गौरव के साथ भ्रष्टाचार को आत्मसात करते हैं.. और शीर्षस्थ  राजनीति, जमीन राजनीति को भ्रष्ट बनाए रखने के लिए काम करती है.. उस पर एक पूरा चित्रण रहा। जिन भी लोगों ने महायज्ञ को देखा है वह उनके मानस से कम ही बाहर जाता होगा।


आज से 45 वर्ष पहले तब रविंद्र नाथ टैगोर पार्क में गांधी चौक के पास विष्णु महायज्ञ हुआ था उसे समय समाज का हर वर्ग मिलजुलकर इस यज्ञ का संपादन किया था ओरिएंट पेपर मिल सके वाइस प्रेसिडेंट आई एम भंडारी स्वयं इस यज्ञ की पूजन कार्य किए थे संभवतः में आजादी के बाद पहला महायज्ञ शहडोल में हुआ था।

 यह भी एक संयोग था कि तब मोहन राम मंदिर शहडोल में एक लक्ष्मी नारायण महायज्ञ.. हमने लोकहित के उद्देश्य से और मंदिर को आम लोगों के बीच में लोकप्रिय  बनाने तथा लगभग पृष्ठभूमि में जा रही मोहन राम मंदिर को सामने लाने के लिए यह यज्ञ किया था.. उस समय जो यज्ञ के कर्ताधर्ता प्रमुख थे  मुझे सचिव का काम सौंपा गया था। उस लक्ष्मी नारायण महायज्ञ से निश्चित रूप से हमने मोहन राम मंदिर में तत्कालीन भ्रष्टाचार वह अराजकता को खत्म करने में सफलतापूर्वक कदम आगे बढ़ा पाए थे. कुछ आध्यात्मिक लाभ भी मिला लेकिन जल्द ही वह भ्रम टूट गया। क्योंकि महायज्ञ के आड़ में धर्म का नकाब पहन कर लोग क्या-क्या कैसा-कैसा अपने लक्ष्य पूर्ति को करते हैं हमने उसकी शुरुआत भी देखी थी। फिर भी उस समय कुछ अच्छे संत, महंत, विद्वान लोगों का शहडोल में आगमन हुआ था।

तब उस लक्ष्मी नारायण महायज्ञ में एक पवित्र उद्देश्य निहित था। तब हम लोगों ने भ्रष्टाचार को मोहन राम मंदिर से हटाने का प्रण लिया था। इसके बाद 2000 के पहले दशक में मुझे भी मोहन राम मंदिर ट्रस्ट में सदस्य के रूप में यानी ट्रस्टी के रूप में एसडीएम कोर्ट में प्रस्तावित किया गया। तब श्री भास्कर राव जो कटनी के बयो वृद्ध नागरिक थे मोहन राम मंदिर की स्थिति से नाराज होने के कारण हमारे साथ न्यायालय मैं न्याय की लड़ाई के लिए के लिए सहमत हो गए थे ।हमने उनके कटनी स्थित आवास में  एक बैठक की थी जिसमें चित्रकूट के पीठाधीश महंत रोहिणीश्वर प्रपन्नाचार्य जो वर्तमान में भी हैं उस बैठक में शामिल हुए। बहरहाल मोहन राम मंदिर में भ्रष्टाचार मुक्ति के लिए जो महायज्ञ पूर्व में किया गया वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर रहा था। अब समय बीत गया है कम से कम शहडोल के मंदिर ट्रस्ट से जुड़ा हुआ संदर्भ में कह सकते हैं पूरा का पूरा धर्म राजनीति का गुलाम है और राजनीतिक उद्देश्य पूर्ति के लिए काम करता है उसका आध्यात्मिक पक्ष लगभग नगण्य हो चुका है।

लेकिन जल्दी ही हमको समझ में आ गया हम एक बड़े भ्रष्टाचार के खिलाफ जो लड़ाई लड़ रहे थे दर असल उससे बड़ा भ्रष्टाचारी धर्म का नकाब पहनकर शहडोल में घुसपैठियों के रूप में घुस रहा था...। हम उसमें फंस रहे थे और हमने पाया भी पुरानी लंका चित्रकूट के पीठाधीश रोहाणेश्वर प्रपन्नाचार्य तब युवा चेहरा थे। उनमें धर्म को लेकर कुछ उत्साह था और हम भी उनके उत्साह में शामिल हो गए थे..

अब इसी मोहन मंदिर में फिर से एक लक्ष्मी नारायण महायज्ञ  फिर चालू होने वाला है। लेकिन इस बार हम इससे दूर है क्योंकि हमें मालूम है यह महायज्ञ किसी पवित्र उद्देश्य को लेकर करने की बजाय धार्मिक और आध्यात्मिक पक्ष में गुरु-परंपरा को मानने वाले लोगों को उपयोग करने के लिए किया जा रहा है. ताकि प्रशासन और शासन को यह बताया जा सके की महायज्ञ करने वाले लोग वास्तव में धार्मिक होते हैं और वह एक भीड़ तंत्र भी रखते हैं अगर उसका संरक्षण सत्ता कर रही है तो प्रशासन को आतंकित और भयभीत रहना सीखना चाहिए। कानून क्या कहता है, मध्य प्रदेश का उच्च न्यायालय क्या कहता है उसे प्रशासन कचरे में डाल दें.. और मोहन राम मंदिर ट्रस्ट के मामले में हाई कोर्ट के निर्देशों को कचरे में रख करके का आंख मूंदकर नकाबपोश धार्मिक लोगों का अनुसरण करें.

 देखा भी गया है कि जब-जब  भ्रष्टाचारी वर्ग का नंगा नाच पर प्रशासन अपनी नकेल कसता है तभी ऐसे महायज्ञ उन्हें याद आते हैं। और इन महायज्ञों से कतिपय लोग अपने भ्रष्टाचार को संरक्षित करते हैं। तो जो महायज्ञ में यजमान इत्यादि होते हैं उन्हें इस भ्रम का दंभ होता है कि वह एक धार्मिक व्यक्ति हैं और धर्म के लिए कुछ कर पा रहे हैं। और ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि गुरु के संरक्षण में यदि आध्यात्मिक का लाभ नहीं मिल रहा है तो कहां मिलेगा यह बड़ा प्रश्न है...?

 इसलिए भी आज भी एक बड़ा वर्ग आसाराम को, य राम रहीम को अपना सच्चा गुरु मानता है भलाई वह बलात्कार में दंडित किए गए हो.. क्योंकि  वह उनका व्यक्तिगत जीवन है... गुरु-शिष्य परंपरा में इसका कोई महत्व नहीं होता और इसे हमारी राजनीति राम-रहीम को बार-बार जेल से छुड़ाकर प्रमाणित भी करती रही है।   

तो  यह एक प्रकार का इवेंट होता है इसका आध्यात्मिक महायज्ञ से कोई नाता नहीं होता ऐसे में गुरु भी खुश; ,शिष्य भी खुश... भ्रष्टाचारी के बल्ले बल्ले होते हैं... टीवी सीरियल महायज्ञ में भी कुछ इसी प्रकार का कथा के रूप में हमें मनोरंजन देखने को मिला था अब यह मनोरंजन वास्तविक रूप से दिखने वाले धार्मिक महायज्ञ में इवेंट के रूप में दिखाई देतें हैं 

.. अन्यथा जब हमने आध्यात्मिक महायज्ञ की शुरुआत की थी उसे समय पवित्र लक्ष्य हमें प्रतिफल के रूप में देखने को मिले वर्तमान परिवेश में ऐसे महायज्ञ एक  अपव्यय मनोरंजन के अलावा कुछ नहीं है.. क्योंकि इनका उद्देश्य किसी साधु संगत प्रसिद्ध संतों का संरक्षण अथवा आध्यात्मिक उन्नति.. जिस उद्देश्य के लिए स्वर्गीय पंडित मोहन राम पांडे जी ने 19वीं सदी के अंत में शहडोल में मोहन राम मंदिर की स्थापना की थी अब वह उद्देश्य विफल होता दिख रहा है..। क्योंकि मंदिर में रहने वाले पुजारी को 10-12 साल से वेतन तक नहीं दिया गया है मंदिर के अंदर पृथक से बने शिव पार्वती मंदिर की छत टूटने की कगार पर है लेकिन भ्रष्टाचारी समाज जिसमें पाखंडी धार्मिक और भ्रष्ट लोग होते हैं उन्हें उसे नहीं बनने दिया, क्योंकि उनका उद्देश्य मंदिर ट्रस्ट को लूटना प्रथम है..

लेकिन इसका एक सुखद पक्ष है की एक धार्मिक इवेंट के रूप में शहडोल जैसे शहर में जहां कुछ नहीं होता वहां ना होने से कुछ  अच्छा होता दिखता है। हलांकि एक लंबे समय के बाद स्टेडियम में राजन जी का राम कथा ने एक सुखद आध्यात्मिक वातावरण बनाने का काम हुआ है इसे अवश्य याद करना चाहिए। 

किंतु लक्ष्मी नारायण महायज्ञ का उद्देश्य अगर भ्रष्टाचार को संरक्षित करना है प्रशासन को उनके कर्तव्य पूर्ति करने से डराना है उसे भयभीत करना है.. तो यह एक धार्मिक अर्ध-सत्य हमें देखने को मिलता है। इस पर हम समय-समय पर चर्चा करते रहेंगे।

 किंतु  धर्म का नकाब पहनकर भ्रष्टाचारी बाहरी लोग कैसे शहडोल की आध्यात्मिक और धार्मिक भावनाओं का शोषण करते हैं जिस कारण से मोहन राम मंदिर ट्रस्ट लूटपाट, भ्रष्टाचार और घटिया राजनीति का अड्डा बन गया है। इसकी पवित्र भूमिका भटक गई है। और इसे प्रमाणित करते हुए तत्कालीन शहडोल के कमिश्नर ने मोहन राम मंदिर में निर्माण कार्यों में जब ढाई करोड रुपए के करीब भ्रष्टाचार के लिए नगर पालिका के कर्मचारियों को दोषी पाया और दंडित किया तभी लगा कि मोहन राम मंदिर अब भ्रष्टाचार का एक अच्छा अवसर बन गया है।तो हम समझने का आगे प्रयास करेंगे कि वास्तव में कैसे राजनीति का भ्रष्टाचार का महायज्ञ, धर्म का महायज्ञ को भ्रष्ट कर रहा है। जिसे प्रशासन के कर्तव्य निष्ठ अधिकारी मुख बधिर होकर देख रहे हैं तो आखिर क्यों देख रहे हैं...?

 

रविवार, 24 नवंबर 2024

नवंबर 2024 चुनावों में बड़ी खबर क्या है...? कौन सा प्यादा होगा आर्थिक राजधानी का मुख्यमंत्री...? (त्रिलोकी नाथ)


23 नवंबर 2024 को लोकसभा उपचुनाव और विधानसभा चुनावों में बड़ी खबर क्या है...? यह चुनाव परिणामों का निष्कर्ष होगा, केरल में वायनाड से प्रियंका गांधी भारी लोकप्रियता के साथ चुनाव जीतने की खबर बाद लोकसभा के अंदर दिखाई देगी या फिर मध्यप्रदेश में कैबिनेट मंत्री रामनिवास रावत चुनाव हार गए हैं यह बड़ी खबर होगी या फिर झारखंड में इंडिया गठबंधन चुनाव जीत गया है इस खबर में कोई दम है अथवा भारत की आर्थिक राजधानी महाराष्ट्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन  ने जीत चुनावी जीत, लहर, आंधी, तूफान या फिर सुनामी के साथ सत्ता में वापसी की है यह बड़ी खबर है...? इनको तलाशना और चयनित करना थोड़ा सा कठिन है...
                                                               -------- (त्रिलोकी नाथ)-------

 तो भारत की आर्थिक राजधानी ही महत्वपूर्ण है जहां पर भारतीय जनता पार्टी ने अकेले दम पर मुख्यमंत्री बनाने का दावा पेश कर दिया है और वहां के पूर्व मुख्यमंत्री तथा धैर्यवान नेता देवेंद्र फडणवीस का स्वाभाविक रूप से मुख्यमंत्री बनना वैसे ही तय है जैसे कि मध्य प्रदेश में तब लगभग इसी तरह की अप्रत्याशित जीत के बाद शिवराज सिंह का मुख्यमंत्री बनना तय हो गया था। और उन्होंने अपने सपने भी बुनने चालू कर दिए थे। लेकिन फिर जो हुआ और जैसे डॉ मोहन यादव मुख्यमंत्री बनाए गए शिवराज सिंह को जीत के लिए खारिज करके वह बड़ी खबर थी क्योंकि तब एक पैटर्न डेवलप किया गया की मुख्यमंत्री हमारा "प्यादा" ही होगा.... तब छत्तीसगढ़ में और राजस्थान में भी इसी तरह अपने प्यादों को शतरंज की बाजी में मुख्यमंत्री बनाया गया..
 तो भारत की आर्थिक राजधानी में प्यादा कौन होगा यह बड़ा प्रश्न है..? क्या कभी-कभी केंद्र से आंखें तरेरने वाले युवा नेता देवेंद्र फडणवीस बेहतरीन प्यादे साबित हो सकते हैं, यह भी बड़ा प्रश्न है। चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गढ़ ही क्यों ना हो नागपुर में और कितना भी आरएसएस अपना आरक्षण पूर्ण हक महाराष्ट्र आर्थिक राजधानी में दावा प्रस्तुत करें बावजूद संपूर्ण और सर्वाधिक योग्यता इस बात पर सुनिश्चित होगा की क्या फणनिवेश की निष्ठा और समर्पण "प्यादे" के रूप में सुनिश्चित है और अगर यह नहीं है तो जीत का आंकड़ा अगर 288 में 288 भी होता तो भी कोई मायने नहीं रखता कि आपने कोई चमत्कार किया है।
 क्योंकि उन्हें मालूम है चमत्कार आपके बस का नहीं है वह सिर्फ केंद्रीय नेतृत्व के नीतिगत फ़ैसलों का परिणाम था। महाराष्ट्र जिस अप्रत्याशित चुनाव को जीता है ऐसे चुनाव पूर्व में छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश और राजस्थान में जीते जा चुके हैं और मध्य प्रदेश की राजनीति का मॉडल बन चुका "लाडली बहन योजना" में चुनाव पूर्व लगभग हर महीने 1000 से ₹3000 देने का वादा करके भारी बहुमत में आना कोई प्रमाण नहीं है और इसीलिए शिवराज सिंह को इसके लिए खारिज कर दिया गया था.. यह भी एक कारण जीत कारण बना था यह केंद्रीय नेतृत्व अच्छी तरह से जानता है की असली कारण राजनीतिक नीतिगत फैसला केंद्र के ही थे... जिसके कारण इन महत्वपूर्ण बड़े राज्यों में भाजपा ने कब्जा किया है।
 बहरहाल इन अनुभवों से यह तो सिद्ध है की शिवसेना नेता  मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे हो या दादा अजीत पवार अथवा पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अगर उनमें प्यादा होने की योग्यता में वह खरे उतर चुके हैं तभी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनेंगे अन्यथा मुख्यमंत्री आसमान से कैसे टपकेगा यह रोचक होगा होगा...
 जैसे मंत्रिमंडल पूर्व फोटोग्राफी होती है उसमें से कोई पीछे से चयनित हो चुका। प्यादा मुख्यमंत्री बनाए गए हैं वैसे ही महाराष्ट्र में जब मंत्रिमंडल के पूर्व सामूहिक फोटोग्राफी होगी उसे वक्त किसके भाग में प्यादा होने का फतवा जारी होता है यह 23 नवंबर 2024 के चुनाव परिणाम की सबसे बड़ी खबर होगी, इसमें कोई संशय नहीं है ।
बाकी महाराष्ट्र की राजनीति में मनोरंजन होता ही रहेगा क्योंकि झारखंड में ऐसे मनोरंजन की कोई गुंजाइश नहीं है वहां पर हेमंत सोरेन सुनिश्चित मुख्यमंत्री हैं। 
टुकड़े टुकड़े रूप में खबर को देख तो दूसरी बड़ी खबर कांग्रेस की धाकड़ प्रवक्ता प्रियंका गांधी वाड्रा का लोकसभा में आना भविष्य की राजनीति का मील का पत्थर साबित होने जा रहा है क्योंकि सदन के अंदर ही कांग्रेस नेता राहुल गांधी को एक बड़ा मोरल-सपोर्ट बैठा हुआ मिलेगा इसमें कोई शक नहीं है... अब सदन के अंदर कांग्रेस में बोलने वाले दो आकर्षक चेहरे हो जाएंगे।
 यह इसलिए भी बड़ी खबर है क्योंकि प्रियंका गांधी के आने के पहले ही चर्चित "रा-मटेरियल" गौतम अडानी अपने भतीजे सागर अडानी के साथ भारत की संसद में हंगामा का मुख्य कारण होगा क्योंकि मोदी सरकार को यह विषय; गौतम अडानी का वर्तमान 2200 करोड़ के भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी को सुनना भी पसंद नहीं है... और कांग्रेस में अब दो प्रमुख चेहरे भाई-बहन राहुल-प्रियंका इसी को बोलने वाले हैं.... इसलिए यह दूसरी बड़ी खबर कहलाएगी ही इसमें कोई शक नहीं है। 
तो तीसरी खबर अपने मध्य प्रदेश में सत्ताधारी भाजपा में कैबिनेट मंत्री की जो कांग्रेस से इस्तीफा देकर बिना विधायक बने मंत्री बन गए थे और चुनाव लड़े तथा चुनाव हार गए उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा भी देना पड़ा यह भी बड़ी खबर है... कम से कम मध्य प्रदेश के लिए इसलिए बड़ी खबर है कि भाजपा में "आयातित नेताओं" का भविष्य क्या अब इस तरह भी सुनिश्चित किया जाएगा... अन्यथा कैबिनेट मंत्री को चुनाव जीतना बाएं हाथ का खेल होता है यह कोई नई चीज नहीं है ... इसका लोकप्रियता से कोई नाता नहीं होता।
 इन ढेर सारी बड़ी खबरे के बीच जो सबसे बड़ी खबर मतदान प्रक्रिया के दौरान रही; उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में आम नागरिकों पर पुलिस द्वारा पिस्टल बाजी के बाद भी वह महिलाएं पिस्तौल से नहीं डरी इसके बावजूद वहां पर चुनाव आयोग को मजबूरन जो कार्रवाई करनी पड़ी उसके भविष्य में क्या परिणाम होंगे महिलाओं को कितना प्रताड़ित किया जाएगा यह भविष्य की खबरें कहलाएंगे जिस पर चर्चा होती रहेगी फिलहाल हम भारत की आर्थिक राजधानी में शतरंज की विसात बिछाई जाने और उसमें प्यादे के मुख्यमंत्री बनाए जाने पर लगातार निगाहें रखेंगे। क्योंकि राहुल गांधी ने स्पष्ट कह दिया है की मुंबई के धारावी की एक लाख करोड रुपए की जमीन में गौतम अडानी का कब्जा होना महाराष्ट्र की राजनीति का अहम पृष्ठभूमि रही है तो इस बात में कितना दम राहुल गांधी दिखा पाते हैं अथवा कोई परिणाम दायी निष्कर्ष में पहुंचते हैं , तब जबकि गौतम अडानी 2200 करोड रुपए की रिश्वतखोरी में एक बड़ी पहचान बन चुके हैं क्या वह भारत की आर्थिक राजधानी में टिक पाएंगे यह भारत की केंद्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण निष्कर्ष होने वाला है।
 और यह निष्कर्ष इतना अब संभव नहीं रहा क्योंकि भाजपा अगर महाराष्ट्र में चुनाव जीत गई है तो दुनिया में अदाणी का चेहरा रिश्वतखोरी को लेकर धुंधला हो चुका है वह न्यायालय चक्कर में फंस चुके हैं और अडानी को स्थापित करना भाजपा की अपनी संपूर्ण साख पर बट्टा लगाना जैसा होगा। तो देखते हैं कि इसके लिए मंत्रिमंडल के पूर्व फोटोग्राफी में कौन सा चेहरा पर टिक लगाया जाता है। क्या याराना के लिए देश की राजनीतिक स्थिति की चुनौती को प्रधानमंत्री मोदी जोखिम उठाएंगे यह हमें देखने को मिलेगा...?








"गर्व से कहो हम भ्रष्टाचारी हैं-4..."//22अरब की घूसखोरी चर्चित होने पर केन्या सरकार ने अदाणी का अनुबंध रद्द किया; शहडोल में अंबानी ने अनुबंध ही नहीं किया तो फिर भ्रष्टाचार कैसा....? - ( त्रिलोकी नाथ )

  उद्योगपति गौतम अडानी के खिलाफ अमेरिका में कथित रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी के आरोप में अभियोग की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि इस कदम से "समूह द्वारा किए गए कदाचार का खुलासा हुआ है"। यह याचिका अधिवक्ता विशाल तिवारी द्वारा अडानी-हिंडनबर्ग विवाद में भारतीय कॉरपोरेट दिग्गज द्वारा शेयर मूल्य में हेरफेर के आरोपों के मामले में एक अंतरिम आवेदन के रूप में दायर की गई है। अमेरिकी न्याय विभाग ने अडानी पर चार भारतीय राज्यों में सौर ऊर्जा अनुबंधों के लिए अनुकूल शर्तों के बदले भारतीय अधिकारियों को 265 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 2,200 करोड़ रुपये) की रिश्वत देने की एक विस्तृत योजना का हिस्सा होने का आरोप लगाया है।अमेरिकी न्यायालय में घूसखोरी के मामले में चल रहे विवाद के मध्य नजर कितने सरकार ने 6000 करोड रुपए की गौतम अडानी के साथ किए गए अनुबंध पूर्ण कार्यों को रद्द कर दिया है क्योंकि वह अपने यहां किसी भ्रष्टाचार को पल्लवित नहीं होने देना चाहता था अथवा अन्य कोई कारण रहे होंगे फिलहाल अनुबंध रद्द कर दिया गया है

 


   
लेकिन जहां अनुबंध हुआ ही नहीं जैसे शहडोल क्षेत्र में रिलायंस सीबीएम जो मिथेन गैस निकाल रही है उसने मध्य प्रदेश सरकार के साथ कोई अनुबंध किया ही नहीं...; यानी शहडोल जिले का जो खनिज विभाग है वह उसके लिए भी अधिकार रखता है कि जब वह अनुबंध करेगा तभी मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस कंपनी गैस को निकल पाएगी क्योंकि अगर इस प्रक्रिया से गैस नहीं निकलती है तो यह अवैध गैस का उत्खनन कहलाएगा.... फिलहाल शहडोल क्षेत्र  में बिना अनुबंध के 2009 से लगातार गैस निकाल रही है और मध्य प्रदेश शासन और प्रशासन लगभग मुकेश अंबानी की कंपनी से गिड़गड़ा रहा है कि कृपया करके अनुबंध कर ले.... लेकिन अदाणी-मॉडल के छुतहे हो चुके, मुकेश अंबानी और उनकी रिलायंस इंडस्ट्रीज इस भुच्च आदिवासी क्षेत्र में कानूनी प्रक्रिया का क्यों पालन करेंगे; जब अपना गुजराती भाई अदाणी दुनिया के सबसे बड़े शक्तिशाली और सतर्क लोकतंत्र वाले अमेरिका में कानून का पालन नहीं करता है तो यह शहडोल तो आदिवासी क्षेत्र है यह बना ही है लूटने और खाने के लिए...?

-------------------- ( त्रिलोकी नाथ )------------------------ 

इसीलिए 2009 से 2024 तक  मध्य प्रदेश सरकार के विहित अनुबंध नहीं किया गया ....और कम से कम भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची में संरक्षित अनुसूचित आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल में इस अनुबंध न किए जाने की घटना को भारत की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियां भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस मिलकर नजरअंदाज करती हैं.... क्योंकि लगभग दोनों का प्रशासन में यह भलीभांति ज्ञात हो चुका है कि उद्योगपति मुकेशअंबानी और उनके नेतृत्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज कानून को नहीं मानता। बस उसके ना मानने को कानूनी मान्यता कैसे मिले गत 15 वर्ष से इस पर लगातार चिंतन और मनन चल रहा है...? विधायिका स्तर पर भी और कार्यपालिका स्तर पर भी। इसीलिए गत 15 साल से गैस का अवैध उत्खनन मुकेश अंबानी और उनकी नेतृत्व रिलायंस इंडस्ट्रीज शहडोल में गैरकानूनी/ अपराधिक तरीके से गैस का धड़ाधड़ निकासी कर रही है... पहली नजर में तो जो इस अनुबंध से पंजीयन के राजस्व का करोड़ों रुपए मिलने वाला था वह लगभग डुबा कर रखा गया है.... शायद राजनीतिक पार्टियों का चंदा और अन्य सहयोग रिलायंस इंडस्ट्रीज की तरफ से इसी "डूबा कर रखे गए" करोड़ों रुपए के राजस्व राशि के ब्याज से आ रहा है...?

यह बात हम इसलिए नहीं कह रहे हैं कि ऐसा हमें गलतफहमी हो रही है..


मेरे अनुभव में शहडोल क्षेत्र में आदिवासी क्षेत्र का उद्धार करने आए 1965 में के एक अन्य ओरिएंट पेपर मिल्स में भी इसी प्रकार की आपराधिक घटनाएं जानबूझकर संरक्षित की गई थी और 1992 से 1998 तक एक लंबी रिपोर्टिंग की अलग-अलग एंगल पर की गई प्रक्रिया के बाद अंततः कांग्रेस की मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को कानून बनाकर ओरिएंट पेपर मिल्स के ऊपर करीब 300 करोड रुपए की रिकवरी निकलना पड़ा था.. और वर्तमान हर माह मिल रही में लाखों रुपए सोन नदी से मिलने वाले पानी के टैक्स के रूप में अलग से देना पड़ा था.. इसी तरह अन्य उद्योगों के साथ इस प्रदेश में होता रहा.. इसलिए यह अनुभव गम्य है।

क्योंकि उद्योगपति शहडोल आदिवासी क्षेत्र में दामाद बनकर आते हैं और सरकारें इन दामादों को तो उनके समस्त गैर कानूनी अपराध को छुपा कर रखना विधायक का और कार्यपालिका की मजबूरी हो जाती है। फिलहाल तो ओरिएंट पेपर मिल्स अमलाई  की घटना से यही प्रमाणित हुआ है। कहते हैं अफीम ने अलग से इस अनुबंध का पंजीयन विभाग में पंजीयन कराया है या नहीं यह भी अभी स्पष्ट नहीं है...? अब सरकार ने ओरियन्ट पेपर मिल कि उसे दलील को स्वीकार करने की दिशा में कुछ काम किया है। जिसमें कहा गया कि वह तो आदिवासी क्षेत्र का उद्धार करने आए थे यानि भगवान के रूप में उन्होंने अवतार लिया था इसलिए वह तथाकथित 300 करोड रुपए की बकाया राजस्व राशि घटकर 70-75 करोड रुपए कर दी गई है...? फिलहाल वह भी नहीं मिली है। ओरिएंट पेपर मिल के सभी कल्याणकारी राजनीतिक कारोबार इन्हीं प्रकार के करोड़ों रुपए के बकाए के ब्याज से चल रहा है...तो यही अघोषित रिश्वत कहलाएगी और भारत में रिश्वत पर कोई कड़क कानूनी व्यवस्था फिलहाल तो उद्योगपतियों के लिए सुनिश्चित नहीं की गई है। इसीलिए भारत में अदाणी ने सोलर एनर्जी पर करीब 2200 करोड रुपए की रिश्वत यानी घू़ंस बताकर कथित तौर पर पांच राज्यों में ठेका हासिल किया है। अमेरिका की न्यायपालिका और जांच एजेंसियां इसे भ्रष्टाचार मानते हैं वह उनकी अपनी समस्या है ऐसा हम फिलहाल के लिए अपनी समझ सुरक्षित रखें.... इसके बाद भी हमें गर्व न हो कि हम भ्रष्टाचारी हैं... तो यह हमारे लिए शर्म की बात है.....?

शुक्रवार, 22 नवंबर 2024

"गर्व से कहो हम भ्रष्टाचारी हैं- 3 " केन्या में अदाणी के 6000 करोड़ रुपए के अनुबंध रद्द, भारत में अंबानी, 15 साल से कहते हैं कौन सा अनुबंध...? ( त्रिलोकीनाथ )

   

मैंने अदाणी को पहली बार गंभीरता से देखा था जब हमारे प्रधानमंत्री नारेंद्र मोदी बड़े याराना अंदाज में एक व्यक्ति के साथ कथित तौर पर उसके प्लेन पर बैठे थे ।उसका नाम गौतम अडानी था फिर धीरे-धीरे यह चर्चित हुआ कि मोदी जी का खास है और सोचने को भी  विवश था था की एक स्टेशन में चाय बेचने वाले परिवार में जन्मे नरेंद्र भाई का इतना याराना इस अरबपति अदाणी के साथ कैसे हो गया...? फिर बातें अडानी अंबानी की जुगलबंदी सत्ता और उद्योगपति से चालू हुई अदाणी एक ट्रेडमार्क हो गया। इसी दौरान दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था नाम की चिड़िया के उड़ने की खबर आई कि भारत तीसरी अर्थव्यवस्था बन रहा है...।

 अपन के समझ में बहुत कुछ आया नहीं.. होता होगा जहां चिड़ियाघर जाएगी वहीं अर्थव्यवस्था पहचानी जाएगी.. बहरहाल अब इन गौतम अदाणी और इसकी भतीजे सागर अदाणी सहित कुछ लग्घु-भग्गू को  को भी किसी 2200 करोड रुपए घूंस के मामले में अमेरिका के एक न्यायालय में अपराधी बनाकर मुकदमा चलाया जा रहा है , सुधारना जरूरी है कि वह आरोपी है कुल मिलाकर पक्षकार है अपराध के मुकदमे में। न्यायालय अमेरिका की जानती करेगी वह अपराधी भी हो जाएगा और जेल भी चला जाएगा...? यह आगे की बात है।

लेकिन भारत के अखबारों में इसको इस बार बहुत महत्व मिल गया जैसे एक भ्रष्टाचार का नया अवतार प्रकट हो गया हो.. उसे ऐसा सम्मान प्रमुख समाचार के रूप में प्रकाशित किया गया है। जैसे इसके पहले अदाणी ने कभी कोई भ्रष्टाचार किया ही ना हो। बावजूद इसकी की फर्श से उठकर अर्श तक इसी जीवन काल में जाने वाले गौतम अडानी अपने ऐसे गुजराती भाई हैं जो अब फिर से फर्श तक जाने की प्रतियोगिता में जुड़ गए हैं... अगर सब कुछ ठीक रहा तो अदानी एक स्वप्न हो जाएंगे।कहा जाएगा एक था अदाणी। जैसे भारत का एक भगोड़ा किंगफिशर का मालिक कभी स्वप्न सुंदरियों के संसार का नायक हुआ करता था अब भारत में मुंह दिखाने लायक नहीं है। क्योंकि वह फरार है, इसलिए मुंह दिखाने लायक नहीं है।

 लेकिन गौतम अडानी के साथ ऐसा नहीं है अगर वह वहां फरार होगा तो भारत में ही आकर रहेगा। जैसे लंदन में किंगफिशर वाला रह रहा है य अन्य जगह मोदी वगैरा रह रहे हैं। क्योंकि भारत ऐसे महान लोगों के लिए अवतरित होने का अवसर देती है। अदाणी उसमें एक है।

चलो मान लेते हैं की अदाणी का अमेरिका में मुकदमा चल रहा है तो चल रहा है क्या फर्क पड़ता है सात समंदर पार कौन देखता है और हमको क्यों चिंतित होना चाहिए..? लेकिन जब शहडोल के रेलवे स्टेशन में आप खड़े होइए तब रेल की पटरी  डब्बे आते जाते दिखते हैं उसमें अदाणी भी लिखा रहता है । प्रगट रूप में ,कहा तो यह जाता है की शहडोल क्षेत्र में जो तीसरी रेलवे लाइन बन रही है उसमें इस अदाणी का ही बड़ा रोल है उसी के लिए ताकि ज्यादा से ज्यादा कोयला इस आदिवासी क्षेत्र से अदाणी के लिए निकाला जा सके; तीसरी लाइन बिछाई जा रही है। यह अंदर की बात है।

बाहर की बात अभी प्रमाणित नहीं है, इसलिए अदाणी को हमको जानना चाहिए कि वह अमेरिका में जब उसके खिलाफ कोई प्रकरण चल रहा होता है तो हो सकता है शहडोल का अदाणी लिखा रेल डिब्बा का खोखा बदल जाए...? क्योंकि अमेरिका में जरूर मुकदमा चला फर्जी वाड़े का।

 एक अन्य केन्या देश की सरकार इस घटना से प्रभावित होकर पूत के पांव पालने में देखने लगी और  तत्काल उसके साथ, यानी अदाणी और उसकी कंपनी जो अदृश्य रहती है अपने अपने राष्ट्र में दोनों को अलविदा कह दिया। यानी 6000 करोड रुपए का अनुबंध रद्द कर दिया। कहते हैं ऑस्ट्रेलिया गवर्नमेंट और दुनिया के अन्य सरकारों ने भी अब इस दिशा में अदाणी की कंपनी जो अदृश्य रहती है उन्हें विकास का अवतार मानने से इनकार कर दिया और अदाणी की क्रिएटिविटी को बजन नहीं दे रही है। क्योंकि उन्हें पता चल रहा है कि यह धोखेबाज लोग हैं। जो अपने राष्ट्र को धोखा देते हैं।

भ्रष्टाचार की इमारत पर अपनी बुलंदगी का झंडा लहराते हैं ऐसे लोग हमारे देश में आकर यही सब सिखाएंगे ..… ।ऐसे लोगों से परहेज रखना चाहिए। आगे-आगे देखते हैं कि क्या होता है कहां-कहां "अदाणी के और उसकी अदृश्य कंपनी के अनुबंध खत्म होते हैं...?

इसीलिए भारत में अदाणी ने सोलर एनर्जी पर करीब 2200 करोड रुपए की रिश्वत यानी घू़ंस बताकर कथित तौर पर पांच राज्यों में ठेका हासिल किया है। अमेरिका की न्यायपालिका और जांच एजेंसियां इसे भ्रष्टाचार मानते हैं वह उनकी अपनी समस्या है ऐसा हम फिलहाल के लिए अपनी समझ सुरक्षित रखें.... इसके बाद भी हमें गर्व न हो कि हम भ्रष्टाचारी हैं... तो यह हमारे लिए शर्म की बात है.....?

 


90.21रुपया प्रति डॉलर/ अरावली पहाड़ियों के लिए ‘डेथ वारंट’ : सोनिया/संसद परिसर में भौं-भौं

रुपया पहली बार 90 के नीचे गिरा, 90.21 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर मुंबई: तीन दिसंबर (भाषा) विदेशी पूंजी की लगातार निकासी और कच्चे ते...