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शनिवार, 5 जनवरी 2019

पुलिस "साप्ताहिक-अवकाश "एक साहसिक मानवीय कदम : त्रिलोकी नाथ




               पुलिस     

       "साप्ताहिक-अवकाश "    

   एक साहसिक मानवीय कदम 


               
5 जनवरी को जनसत्ता में प्रकाशित यह व्यंग्य दशकों बाद आई की पुलिसिया-व्यवस्था में मानवीय-श्रम की संवेदना के शोषण का एक गुदगुदा किंतु परंपरा से प्रथा बनी पुलिस 
`व्यवस्था का प्रमाण है. कि किस प्रकार से भारतीय पुलिस व्यवस्था में एक शोषणकारी आंतरिक व्यवस्था ने अनुशासन का नकाब पहनकर मानवीय श्रम को अपमानित किया था. मध्यप्रदेश के मुख्य मंत्री कमलनाथ अनुभवी राजनीतिक व्यक्ति होने के कारण ही कांग्रेस के वचन पत्र की दमन व शोषणकारी पुलिस अनुशासन की व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता के काम पर सुधार करने का काम किया है, निश्चित ही वह पुलिस सुधार के कदम पर बधाई के पात्र हैं.
   
                                                                                                                                                                              त्रिलोकीनाथ )

कम वेतनमान पर 24 घंटे की ड्यूटी किसी बंधुआमजदूर की तरह राजतंत्र में पनप रहे पुलिस व्यवस्था की याद दिलाती है. जिसमें उसे उस पुलिस कर्मचारी को स्वतंत्र भारत में होने का एहसास सिर्फ इस बात पर नहीं हो जाता है कि वह अपनी नौकरी और अनुशासन में सीखे हुए जीवनक्रम को भारत की शेष नागरिक सेवा में उसी नजरिए से जीने का प्रयास करता था, स्वाभाविक है कि व्यक्ति अपने अनुभवों को ही समाज में और परिवार में देखता है. यदि कोई पुलिस का सिपाही अपने जीवन में बंधुआमजदूरी और शोषणकारी अनुशासनिक व्यवस्था का नकाब पहनकर व्यक्तिगत जीवन को ही लोकतंत्र के रूप में देखता है तो वह समाज को भी वही सब कुछ बांटने का प्रयास करता है जो उसके व्यक्तित्व का और चरित्र का हिस्सा बन जाती है.. फिर लोग कहते थे कि पुलिस बहुत खराब विभाग है.. ?


 सोशल पुलिसिंग के बहुत से नवाचार हो रहे हैं, उसी में एक है महिला पुलिस की संख्या में बढ़ोतरी. किंतु जब तक नैतिक व मौलिक दायित्व पर जाए तब बंधुआ या शोषणकारी व्यवस्था में महिलाओं की एंट्री एक खतरनाक खेल भी है. हाईटेक व्यवस्था ने इसमें अवरोधक खड़े करने का काम सीसीटीवी के जरिए अथवा पारदर्शिता के नाम पर जरूर हुआ है किंतु वास्तव में जैसा कि मीटू आंदोलन जैसे नए घटनाओं का सार्वजनिक कारण हुआ है उससे स्पष्ट है कि पत्रकारिता में ही जहां नैतिकता का ठेका लिया गया था, वहां पतन की पराकाष्ठा रही हो और जिसकी चरम स्थिति प्रमाणपत्र के रूप में आज हमारे पास है कि एमजे अकबर जैसे वरिष्ठ पत्रकार को भी भारत की कैबिनेट मंत्रीमंडल से अपमानजनक हालात में इस्तीफा देकर अपना पिंड छुड़ाना पड़ा. और कानूनी व न्यायालय के संरक्षण में मुंह छुपाने का प्रयास हो रहा है. ऐसे हालत में अनुशासन के नकाब पर पुलिस की व्यवस्था में महिला पुलिस बल को पुरुष पुलिस बल के साथ कदम से कदम मिलाकर काम करना एक बड़ी चुनौती भी है. जिसमें मुख्यमंत्री कमलनाथ का पुलिस व्यवस्था में साप्ताहिक अवकाश मील का पत्थर साबित होगा. बावजूद इसके बहुत कुछ है जो पुलिस सुधार में एक लोकतांत्रिक पुलिस व्यवस्था को पारदर्शी तरीके से करना चाहिए.

 शहडोल के एक पुलिस कर्मचारी ने मुझे बताया कि किस प्रकार से अचानक पुलिस हेड क्वार्टर से जानकारी मंगा ली जाती है और पुलिस कर्मचारी जब ट्रेन में जाता है तो कहने के लिए उसे भलाई पुलिस की सीट एसी का टिकट मिला हो किंतु यदि ट्रेन में रिजर्वेशन नहीं है तो उसे खड़े खड़े ही भोपाल तक की लंबी यात्रा करनी होती है. यह भी पुलिस में सुधार का एक बड़ा अवसर है.. तब जबकि पुलिस, रेल-पुलिस के रूप में अपनी सेवाएं देती है. वह अभी तक छोटी-छोटी तकनीकी सुधारों के लिए सोचने का अवसर भी नहीं निकाल पाई है..? जबकि स्वयं पुलिस को ही इन्हें ठीक करना है. इसका मतलब है कि बंधुआपन और शोषणकारी व्यवस्था में व्यस्तता अनुशासन के नाम पर इस कदर हावी है कि वह अपनी आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था को ठीक करने में असफल रही है.

  इन हालातों में यदि पतित राजनीति से ऊपर उठकर कोई मुख्यमंत्री अपने जुमला नुमा वादा की पोटली से पुलिस सुधार के कई दशकों में अतिक्रमण करते हुए इसका अध्यादेश जारी करता है कि हफ्ते में एक दिन एक मानव को उसे श्रम से मुक्त करते हुए अवकाश दिया जाए, तो यह भी हमारे 70 साल की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अहम पड़ाव माना जाना चाहिए. जिसके लिए कमलनाथ बधाई के पात्र हैं.
 निश्चित तौर पर बंधुआ मजदूरी और शोषणकारी आंतरिक अनुशासनिक व्यवस्था में बौद्धिक आईपीएस अधिकारी नए-नए नवाचार करके पुलिस की आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था कुछ ज्यादा मजबूत और ज्यादा स्वस्थ इसलिए भी करेंगे कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए एक मजबूत अनुशासनिक संगठन, स्वस्थ विचारों वाला, नैतिक मापदंडों से भरा-पूरा होना ही चाहिए.
 यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि मुझे याद है कि जब मैंने 1996-97 के दौर में अपने अखबार विजयआश्रम को शहडोल जिलापंचायत से जोड़कर प्रयोग कर रहा था, उसी दौर में मैंने पाया की पंचायतीराज व्यवस्था के आंतरिक भ्रष्टाचार ने किस प्रकार से कई प्रकार की पंचायत प्रतिनिधियों में आत्महत्या, हत्या के मामले देखे गए. किंतु उनका निराकरण पुलिस ने मात्र लीपापोती करके खत्म कर दिया. मैं तो सिर्फ शहडोल में देख रहा था, वास्तव में वह सब किसी बटुआ की भात की तरह पूरे मध्यप्रदेश में पंचायतीराज व्यवस्था में पंचायती प्रतिनिधियों खासतौर से महिला-प्रतिनिधियों के साथ हो रहा था. और जिस लाचार पुलिसविभाग पर यह अहम जिम्मेदारी थी कि वह महिला-रिजर्वेशन के तहत आई पंचायतीराज के प्रतिनिधियों विशेषकर अथवा अन्य पंचायती प्रतिनिधियों के आत्महत्या अथवा हत्या के मामले लोकतंत्र की न्याय प्रक्रिया के साक्षी बनते..?, वे उसे विधायिका के दवाब में भ्रामक तरीके से गायब करा दिए और यह इसलिए नहीं हुआ पुलिस सिर्फ भ्रष्ट थी, बल्कि इसलिए , कि वह अनुशासित रूप में एक बंधुआ-मजदूर की तरह अपनी पुलिस के सिपाही का सदुपयोग और लोकतंत्र के हित में काम नहीं कर पाई..?
 

आशा किया जाना चाहिए कि हफ्ते में एक बार पुलिस कर्मचारी जब अपने घर में अपने परिवार के साथ बैठेगा तो स्वस्थ-चिंतन, नैतिक मापदंडों और सामाजिक दायित्व के सामाजिक सरोकारों पर भी मंथन करेगा और सहजजीवन प्रणाली का भागीदार होगा. उसी उत्साह उमंग तथा खुशी के साथ जिसके साथ अन्य भारतीय नागरिक शामिल होने का प्रयास करता है. तो पुनः बधाई, दशकों से बाद आई सप्ताहिक अवकाश की घोषणा की.



गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

गुरुओं के बीच में गुरु -घंटाल



        गुरुओं के बीच में गुरु -घंटाल




     
       कौन बनेगा कांग्रेस का मुख्यमंत्री...?

                                                 (  त्रिलोकीनाथ  ) 

 मध्यप्रदेश राजनीतिक-माफिया के काकस से शायद ही मुक्त हो पाए..? देखना होगा कि अंततः गुरुओं के बीच में गुरुघंटाल कितना कुछ सफल हो पाते हैं..?

जब पहली बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बनने का  जद्दोजहद कर रहे थे, उस वक्त भी यही हालात थे. जो वर्तमान में दिख रहा है. उस वक्त विंध्यप्रदेश में श्रीनिवास तिवारी नाम कि वह शख्सियत हुई थी, जिससे दिग्गीराजा भयभीत रहते थे और इसीलिए उन्होंने अर्जुनसिंह के खिलाफ श्रीनिवासतिवारी का यह कहकर अंत तक उपयोग किया कि श्री निवासतिवारी रीवा के मुख्यमंत्री है दरअसल यह संज्ञा दिग्विजय सिंह के लिए तब एक ब्रह्मास्त्र थी. अर्जुनसिंह के खिलाफ और उनकी व्यक्तित्व को क्षतिग्रस्त करने का औजार था. हालांकि एक और तीर का उपयोग उन्होंने अजय सिंह राहुल के रूप में भी सेंधमारी कर के किया था किंतु अंततः अजय , अर्जुन सिंह के लड़के ही थे. तो वह इतना घातक नहीं था जितना कि श्री तिवारी को ब्रह्मास्त्र बनाना.समय की नजाकत को पहचान कर तब अर्जुनसिंह जी ने श्री तिवारी के साथ मध्यस्थता कर राजनीतिक मतभेदों को खत्म करना भी चाहा.
 किंतु ब्रह्मास्त्र चल चुका था, तो उसे अपने लक्ष्य, जिसमें स्वयं ब्रह्मास्त्र को नष्ट भी हो जाना था, पाना ही था. बहराल उस वक्त शहडोल के नेता आदिवासी नेता दलवीर सिंह जो प्रदेश कार्यवाहक अध्यक्ष भी थे और मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी. प्रदेश में आदिवासी नेतृत्व को कमजोर करने के लिए पिछड़ा वर्ग का कार्ड चला, जिसमें सुभाष यादव नामक ओबीसी कार्ड तब दिग्गी राजा ने इसलिए चलाया की कोई आदिवासी नेता अपना दावा पेश न कर सके और शतरंज की बिसात ने कार्ड टिक गया. तो दिग्विजय सिंह स्वयं को मुख्यमंत्री बनाने में सफल हो गए.
 आज फिर जो हुआ वह आईने की तरह साफ है. विंध्यप्रदेश के अर्जुनसिंह हो या श्रीनिवास तिवारी या मालवा के सुभाषयादव सब की राजनीति लगभग लुप्त हो गई. 10 वर्ष की कांग्रेसी सुख-सत्ता का लाभ दिग्विजय सिंह ने लिया. हां कांग्रेस जरूर धरातल में चली गई. अभी जो कॉन्ग्रेस आई है, इसलिए नहीं आई किसी ने कुछ किया है बल्कि भाजपा की सत्ता विरोधी जो शबनमी अंदाज में सत्ता परिवर्तन हुआ है . यह अलग बात है कि कांग्रेस हाईकमान ने दिग्गी राजा की सभी चालो को पहचान लिया और उन्हें प्रदेश की राजनीति में दूर रखने का प्रयास किया. बावजूद इसके दिग्गी राजा का राजवाड़ा कायम रहा और अपने कूटनीति के जरिए अंततः सत्ता के करीब पहुंच गए.
 यह काल्पनिक नहीं है क्योंकि कड़े संघर्ष में सत्ता-परिवर्तन कांग्रेस के जो चेहरे राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के पास प्रस्ताव लेकर पहुंचे उसमें सुभाषयादव के पुत्र अरुण यादव को प्रमुखता से खड़ा दिखाया गया है. अरुण यादव कोई चुनाव जीतकर नहीं आए हैं, वैसे ही जैसे कि अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह चुनाव हार गए हैं. बल्कि अरुण यादव तो करारी हार हारे हैं. इसके बावजूद भी देश की पहली पंक्ति में ओबीसी नेता कार्ड के रूप में दिग्विजय सिंह ने उन्हें प्रस्तुत किया है. यह अलग बात है कमलनाथ, दिग्विजय सिंह की करीबी हैं. सरकार बनाने के प्रस्ताव में कांग्रेस के जो चेहरे राज्यपाल महोदय के समक्ष दिखे उसमें सिर्फ ज्योतिरादित्य सिंधिया का चेहरा ही कांग्रेस का प्रथम व लोकप्रिय चहरा है, जो दिग्गी राजा की कूटनीति से अलग दिखाई देता है. विवेक तंखा तो वकील हैं, राज्यसभा सांसद होने के नाते नेता भी बन गए हैं. ऐसी स्थिति में गुरु घंटाल का रोल पुनः सक्रिय हो गया है. और गुरु घंटाल ही गुरुओं की पद नियुक्ति में अपनी अहम भूमिका साबित करते हुए दिखेंगे.
 वैसे ही माना जाए तो आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर एक परिपक्व राजनीतिक कमलनाथ को प्रदेश की बागडोर कांग्रेस के हित में होगा. बावजूद इसके प्रदेश की राजनीति को निष्पक्ष एवं निडर चेहरा, ज्योतिरादित्य का है जो लोकप्रिय है मध्य प्रदेश की कांग्रेस की राजनीति के लिए उसे मुख्यमंत्री होना चाहिए .माना जाए तो राहुल गांधी की पहली पसंद भी. क्योंकि जिस प्रकार से उन्होंने युवाओं के हाथ कमान दे कर वरिष्ठ राजनीतिज्ञ का सम्मान बनाए रखने का काम किया है, उसमें भी ज्योतिरादित्य एक फिट मुख्यमंत्री हो सकते हैं. किंतु गुरु घंटाल के चलते शायद ही यह प्रयास सफल हो पाएगा...? क्योंकि निडर और निष्पक्ष राजनेता होने के नाते ज्योतिरादित्य शायद ही मध्यप्रदेश के तमाम भ्रष्टाचार पर कोई समझौता कर पाएंगे...?, जो राजनीतिज्ञों ने विभिन्न पार्टियों में राजनीति का नकाब पहनकर प्रदेश को लूटने और लुटाने का धंधा बना रखा है. उसे कायम कर, बनाकर रखना ज्योतिरादित्य की फितरत में शायद ही होगा...?

 और यही कारण है कि प्रदेश, राजनीतिक-माफिया के काकस से शायद ही मुक्त हो पाए..? देखना होगा कि अंततः गुरुओं के बीच में गुरुघंटाल कितना कुछ सफल हो पाते हैं..?

90.21रुपया प्रति डॉलर/ अरावली पहाड़ियों के लिए ‘डेथ वारंट’ : सोनिया/संसद परिसर में भौं-भौं

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