बुधवार, 23 सितंबर 2020

यह किसानों के विनाश का बिल है- आनंद


किसान बिल को लेकर समाजवादी पक्ष मे घोर निराशा; समाजवादी नेता आनंद ने कहा


यह किसानों का विनाश-बिल है।

 बिलासपुर छत्तीसगढ़ के कद्दावर समाजवादी नेता मीसाबंदी आपातकाल के योद्धा आनंद मिश्रा बोले–किसानों के विनाश का बिल है कृषि बिल… क्या मुंगेली का किसान अपना पाँच बोरा धान बेचने बैंगलुरू जायेगा??

 

“कृषि बिल किसानों के विनाश का बिल है। इससे किसानों को नुकसान होगा और कारपोरेट खेती को बढ़ावा मिलेगा।यदि मोदी सरकार किसानों के हित की बात करती है, तो उसे यह ऐलान करने में एतराज क्यों है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम में अनाज की खरीदी नहीं होगी।यह बातें प्रखर समाजवादी नेता और किसानों के चिंतक आनंद मिश्रा ने एक बातचीत के दौरान कही।


उन्होंने कहा कि केंद्र की भाजपा सरकार ने किसानों के नाम पर जो बिल आया है।वह किसानों के विनाश का बिल है।दरअसल भारत को आर्थिक रूप से गुलाम बनाने में सबसे बड़ी बाधा कृषि के क्षेत्र को लेकर है।कृषि जो आत्मनिर्भर भी है और स्वयंभू भी है।  उसे खत्म करने के लिए लगातार कोशिश यह सरकार पिछले 6 साल से कर रही है।खेती को खत्म करने के लिए सबसे पहला कदम है कि एमएसपी (मिनिमम सपोर्ट प्राइस, न्यूनतम समर्थन मूल्य) को खत्म किया ज़ाए।वह एमएसपी खत्म नहीं कर पा रही है।इसलिए यह नया रास्ता निकाला है।मजे की बात है कि आर्थिक मोर्चों पर नाकाम साबित होने के बावजूद इस सरकार में बैठे लोग इस तरह का कदम उठा रहे हैं।


आनंद मिश्रा ने कहा कि देश में 70 फ़ीसदी छोटे किसान है। मंडी की व्यवस्था खत्म हो जाएगी तो वे अपना अपनी उपज कहां बेचेंगे। उन्होंने सवाल किया कि क्या मुंगेली का किसान बेंगलुरु जाकर अपना पाँच बोरा धान बेचेगा …? क्या एक छोटा किसान टेलीफोन से रेट पता करके प्रदेश या देश के दूसरे हिस्से में जाकर अपना उपज बेच सकेगा।वे मानते हैं कि इसके पीछे एक वजह यह भी है कि मंडियों के संचालन से जो टैक्स मिलता है ,वह पूरी तरह से राज्य सरकार को मिलता है।इसे खत्म कर केंद्र की सरकार राज्य को अपना पिट्ठू बनाना चाहती है।इसके साथ ही जो तरीका अपनाया जा रहा है।उससे कारपोरेट फार्मिंग को बढ़ावा मिलेगा।जो कि बहुत ही खतरनाक है।

भारत का इतिहास बताता है कि किस तरह उपनिवेशवाद आया।स्वायतता  को खत्म करके लोगों को गुलाम बनाया गया।जो आत्मनिर्भर व्यवस्था थी उसे खत्म किया गया और एक केंद्रीकृत व्यवस्था बनाई गई।

आनंद मिश्रा कहते हैं कि लोग मंडी में अनाज बेचते थे तो सरकार के पास रिकॉर्ड रहता था कि कितना अनाज खरीदा गया है और कितना स्टोर कर रखा गया है।अब इस अनाजों को आवश्यक वस्तु अधिनियम से बाहर किया जा रहा है।जिससे सरकार के पास इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं होगा कि कितना अनाज खरीदा गया और कितना भंडारण किया गया।इस तरह से सरकार कारपोरेट के हाथ में पूरा व्यापार देने जा रही है।जो छोटे–मझोले व्यापारी इस क्षेत्र में लगे हुए थे और हजारों हाथों को इनकी वजह से रोजगार मिला हुआ था।वह पूरी तरह से खत्म हो जाएगा।गुलाम बनाने के लिए एक केंद्रीकृत व्यवस्था बनाई जा रही है।जिससे कारपोरेट जगत जो कहे वही पैदा किया जा सके।यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें लोगों को न्यायालय जाने का भी मौक़ा नहीं मिल पाएगा।सारे विवाद ट्रिब्यूनल में हल होगे ट्रिब्यूनल कलेक्टर की अदालत होगी और सभी जानते हैं कि इसमें काम किस तरह होता है।


आनंद मिश्रा की चिंता इस बात को लेकर भी है कि जिस तरह पंजाब से विरोध के स्वर उठ रहे हैं ,उससे साफ़ ज़ाहिर होता  है कि पंजाब के किसान इस बिल से खुश नहीं है।चिंता की बात यह है कि जब भी पंजाब में किसान की हालत खराब होती है ,तो वह क्षेत्र अशांत तो होता है।पहले भी हम इसके परिणाम भुगत चुके हैं।अब देश इस तरह के अशांति को बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है।इस पर भी सरकार को ध्यान देना चाहिए।आनंद मिश्रा ने कहा कि राज्यसभा में जिस तरह से बिल पास कराया गया।सभी ने देखा है।कोविड-19 के बहाने सरकार कुछ भी करना चाहती है।वह तो अभी आम चुनाव भी करा सकती है।जिससे फिर 5 साल के लिए उसे गद्दी मिल जाए।राज्यसभा में यह बिल ध्वनिमत से पारित किया गया।जबकि प्रावधान के मुताबिक वोटिंग होना चाहिए।वे आगे कहते हैं कि जिस तरह से स्पेशल ट्रेन-स्पेशल रोड का चलन बढ़ता जा रहा है ,उससे लगता है कि सामान्य आदमी के चलने के लिए भी सड़क नहीं मिलेगी।कृषि बिल से किसान को कोई फायदा नहीं होगा।अगर मोदी सरकार किसानों के हित की बात करती है तो उसे यह ऐलान करने में क्यों एतराज है कि समर्थन मूल्य से कम में अनाज की खरीदी नहीं होगी।उन्होंने यह भी कहा कि इस सरकार में बैठे लोग और नीति आयोग से जुड़े लोग पहले भी संकेत दे चुके हैं कि वे समर्थन मूल्य के पक्ष में नहीं है।दरअसल इसकी वजह यह है कि समर्थन मूल्य होने से गांव के मजदूरों की मजदूरी बढ़ती है।  इससे उद्योग और रियल एस्टेट सेक्टर को सस्ते में मजदूर नहीं मिल सकते।इंडस्ट्री और रियल स्टेट को सस्ते में मजदूर मुहैया कराने के लिए वह न्यूनतम समर्थन मूल्य को ही खत्म करना चाहते हैं।


यह पूछे जाने पर कि इसका छत्तीसगढ़ पर क्या असर होगा आनंद मिश्रा कहते हैं कि छत्तीसगढ़ देश का हिस्सा है।यहां भी विपरीत असर पड़ेगा।छत्तीसगढ़ के लोगों ने पिछले साल भी देखा है कि केंद्र की ओर से प्रदेश सरकार को धमकी दी गई थी कि 16  सौ  से अधिक कीमत पर धान खरीदी की गई तो हम नहीं खरीदेंगे।इस बार भी यही बात हो सकती है।सरकार ने अब अनाज का भंडारण नहीं करने का फैसला किया है।अनाज का भंडारण किए जाने से खर्च होता है और भ्रष्टाचार होता है।इस पर रोक लगाने के नाम पर भंडारण को ही खत्म किया जा रहा है।  इससे बुरा असर होग।वे यह भी मानते हैं कि इस बिल के बाद छोटे किसानों को अपनी जमीन बचाना मुश्किल होगा।खेती कारपोरेट से जुड़े लोगों के हाथ में जा सकती है।अमेरिका जैसे देश के उदाहरण है ,जहां केवल 3 फ़ीसदी लोग खेती करते हैं।लेकिन कारपोरेट खेती की वजह से वहां किसानी का दिवाला निकल गया और किसानों को सब्सिडी देनी पड़ रही है।भारत में भी इस तरह की स्थिति ना आ जाये।इसलिए इस बिल का पुरजोर विरोध हो रहा है और होना भी चाहिए।

यह अलग बात है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी


और उसकी सरकार तथा उनके कर्मयोगी-अंधभक्त इसे अभी विकास का बिल बता रहे हैं

हो सकता है दोनों में कृषि विकास को लेकर चिंता हो और मतअंतर भी इसी के निवारण के लिए भारतीय संसद की व्यवस्था संविधान में की गई थी किंतु डॉन के निर्दश से हरिवंश जो समाजवादी पृष्ठभूमि के राज्यसभा में उपसभापति हैं उन्होंने इसे बिना मत विभाजन के ध्वनि मत से पारित करा दिया और विरोध करने वाले सदस्यों को सदन से निलंबित कर दिया शायद भारतीय संसद किसानों की बिल को उचित मंथन के बाद समुचित स्थान देती ।

अब यह किसानों के विनाश का या विकास काबिल है... कोरोनाराम के भरोसे हो गया जो नया भारत का नया भगवान है.....



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