रविवार, 3 मई 2020

कोरोना युग का रामायण, कलयुग के राम और राजधर्म------भाग-1 (त्रिलोकीनाथ)

कोरोना युग का रामायण, 
कलयुग के राम और
राजधर्म------भाग-1

(त्रिलोकीनाथ)
दूरदर्शन द्वारा कोविड-19 महामारी के कष्टदाई अवसर पर लोगों को आध्यात्मिक सुख देने के दृष्टिकोण से पौराणिक ग्रंथों पर आधारित रामानंद सागर के बहुचर्चित सीरियल रामायण में उत्तरकांड का समापन बड़ी मार्मिकता के साथ हुआ। 2 दिन के स्पेशल 2 घंटे के प्रसारण में राम के पुत्रों लव व कुश की प्रस्तुति, स्वयं को साबित करना और वनदेवी (मां सीता ) नामक स्त्री के चरित्र सत्यापन की दशा व दिशा को भगवान बाल्मीकि द्वारा स्वयं के अस्तित्व को दांव में लगाकर स्थापित करने के प्रयासों का फिल्मांकन त्रेता युग के कथा चरित्र का अनुपम उदाहरण देखने को मिला ।
जो वर्तमान राजनीति में बार-बार अयोध्या के महाराजा राम के "राजधर्म" को किस प्रकार होना चाहिए, इसे किस स्तर की कसौटी पर स्थापित करना चाहिए ....यह दिखाने का प्रयास बेहद आत्मिक आनंद देने वाला तो रहा ही।
 किंतु तब के राजा राम का "राजधर्म" का आज के समय में उपयोगिता उसकी उत्कृष्टता का पतन और कलयुग में परम भक्त हनुमान की उपस्थिति वर्तमान साक्ष्यों के परिपेक्ष लिपिबद्ध करना अत्यावश्यक कार्य है।

 हमने भी समझने का प्रयास किया सनातन धर्म का राम और उनका "राजधर्म" कब वर्तमान संदर्भ में कितना उपयोगी है क्या उसे आदर्श परिस्थिति के रूप में रखना चाहिए... अथवा अपने ड्रेसिंग रूम में तस्वीर में सजावट की वस्तु के रूप में....? अथवा  एक कुशल दुकानदार की तरह अपना माल विक्रय करने के लिए आकर्षक फर्नीचर की तरह उपयोग करना चाहिए...? 
 तब के राजा राम  की निजी निष्ठा में "सिद्ध संपूर्ण सत्य" और लोकहित में समर्पित लोकमत को सत्यापित करने के लिए "दिखाने वाले सत्य" का अंतरसंघर्ष मात्र है..।यह भी वर्तमान परिस्थिति की का विरोधाभास है ।क्योंकि जो हो रहा है जिनके द्वारा कराया जा रहा है अथवा किया जा रहा है या फिर समय की नजाकत के हिसाब से माइंड-सेट किया जा रहा है...? 
क्या राम का "आदर्श राजधर्म" त्रेता युग में ही खत्म हो चला था...? चलिए इसको समझने का प्रयास करते हैं। तो पहले त्रेता युग के महाराज राम व कुछ संक्षेप में उनके राजधर्म को समझें..., जिसमें उन्होंने अपनी माता कौशल्या को अपनी हृदय की कोमलता को बंद कमरे में प्रकट किया.., कि वह जानते हैं की महारानी सीता संपूर्ण सती हैं... उन पर किसी भी प्रकार का अविश्वास वह नहीं करते।
 किंतु राजा के पद पर "राजधर्म" का आवश्यकता है कि वह "संपूर्ण वास्तविक सत्य" और "दिखने वाले सत्य" में दिखाने वाले सत्य को परिभाषित करने का काम करेंगे....। फिर भी इस राजधर्म की व्यवस्था को राम की मां कौशल्या स्वीकार करने को तैयार नहीं थी। ऐसा प्रदर्शित किया रामानंद सागर ने, क्योंकि कहीं ना कहीं स्त्री को कमजोर होने के कमजोरी को राम तर्क दे रहा थे। वर्तमान परिस्थिति में राज माता कौशल्या का कसक अवतरित हो चुका है। क्योंकि राजधर्म की उसकी उपयोगिता और उसकी सार्थकता "यूज एंड थ्रो" का मटेरियल मात्र बनकर रह गई दिखती है।
हाल में "राजधर्म " शब्द तब बहुत चर्चित हुआ जब सत्ता में अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री थे और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। नरेंद्र मोदी पर आरोप लगा था कि जो सांप्रदायिक झगड़े गुजरात में हुए उसमें उन्होंने धर्म विशेष के लोगों के साथ पक्षपात कर हिंसा किया। यह कलंक उनके माथे पर सिर चढ़कर बोल रहा था तब उसकी बहुत आलोचना-प्रत्यालोचना भी हुई। मुकदमे भी शायद अभी लंबित हो... बहुत सारे मुकदमे वर्तमान परिस्थिति में तो जैसा निराकरण होना चाहिए था, वैसा निराकरण भी हो गया ।
उस दौर मेंपत्रकारों के सवाल के जवाब में अपने चिर परिचित अंदाज में कुछ थमकर प्रधानमंत्री अटल  बिहारी वाजपेई  बोले,
" राजधर्म का पालन होना चाहिए। मुख्यमंत्री को राजधर्म का पालन करना चाहिए। जाति, वर्ण या संप्रदाय के आधार पर भेद नहीं होना चाहिए।"
 इस एक शब्द से उन्होंने नरेन्द्र मोदी को बड़ी सीख दे दी। हालांकि इसके ठीक बाद अटल जी बोले कि उन्हें विश्वास है कि नरेंद्र मोदी अपने राजधर्म का पालन कर रहे...
सत्ता के संरक्षण में हिंसा का नंगा नाच सांप्रदायिकता की कसौटी में कसा जा रहा था जो आजादी के बाद की कड़वी सच्चाई थी हालांकि तब मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस गंभीरता से उनके बताए राजधर्म को अस्वीकार कर दिया। और गुजरात में जो हुआ वे उसे ही राजधर्म की संज्ञा देने में लग गए । यह वह दौर था जब गुजरात की सांप्रदायिकता का खून सिर चढ़कर बोल रहा था । उसका आतंक सत्ता के संरक्षण में इस कदर हावी था कि प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों कि किसी की हिम्मत नहीं थी कि वे गुजरात को इस माहौल से उबारने का काम करते हैं तब अटल जी के संकटमोचक रहे रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस अकेले ही गुजरात की गलियों में हालात को टटोलने के लिए पहुंचे थे और लोकतंत्र के निष्ठा का वातावरण दिखाने का काम किया यह भी उनका राजधर्म था।  
(रामायण के चरित्र पात्र अरविंद त्रिवेदी ने स्वयं आज अपने चरित्र रावण को देखा तो भाव विभोर हो गया यह चित्र काफी चर्चित रहा)
                (4-5-20)जारी भाग2

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